हिंसा समाप्त हो जाती है जब प्रेम शुरू होता है।
– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
बिहार का एक गाँव सेनारी, नकसलियों के द्वारा अकसर हत्याकांड के लिए जाना जाता है (रणवीर सेना, कमयूनिसट पार्टी ऑफ इंडिया (एम एल)। पीपल्स वार ग्रूप, और माला कुछ ऐसे नकसली संगठन हैं जो सेनारी में काफी मशहूर हैं और इनके कारण गाँव भर के लोग भयभीत थे। श्रीमती इंदु सिन्हा, आर्ट ऑफ लीविंग संस्था में कार्यरत, ने अहिंसा के बीज को इस क्षेत्र में लाने की हिम्मत जुटाई।
अगस्त २००० में श्रीमती इंदु सिन्हा ने बिहार के एक लोकल अखबार में एक रिपोर्ट पढ़ी जिसमें गाँव सेनारी में हुए एक हत्याकांड के बारे में लिखा था जहाँ 67 लोगों को नकसलियों द्वारा मौत के घाट उतारा गया। बिहार के गाँवों में ऐसी दहला देने वाली खबरें आम बात हो गई थीं और लोगों ने इसे आम जीवन का हिस्सा मान लिया था। बचपन से ही लोग हिंसा और मौत की खबरें पढ़ और सुन रहे थे। जब श्रीमती सिन्हा को गाँव के इस हत्याकांड के बारे में पता चला तो उन्होंने सोचा कि उन्हें इस बारे में कुछ करना चाहिए।
विद्यालय का आरम्भ
दिल्ली में गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी से वार्तालाप के दौरान, श्रीमती सिन्हा ने बिहार के गाँवों में मानव मूल्य गिरने के बारे में अपनी भावनाएँ प्रकट करीं। गुरूदेव श्री श्री रवि शंकर जी ने उन्हें गाँव सेनारी में एक विद्यालय शुरू करने का प्रोत्साहन दिया। वह गाँव के हालात बदलने के लिए चल पड़ीं। परंतु ऐसे कुख्यात गाँव में जगह बनाना बहुत मुश्किल था।
पानी से जूझती हुई वह तीन घंटे बाद गाँव पहुँचीं। जैसी उम्मीद थी, हत्याकांड ने बहुत से संचार माध्यम का ध्यान अपनी ओर खींचा। बहुत सी सामाजिक संस्थाओं ने हालात सुधारने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजने की कोशिश की पर किसी को सफलता नहीं मिली। श्रीमती सिन्हा के लिए सबसे पहला और जरूरी काम था माताओं और पिताओं को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए तैयार करना।
दूसरा पक्ष देखा जाए तो बच्चों को विद्यालय भेजना माता पिता के लिए सबसे अंतिम काम था। श्रीमती सिन्हा ने हर बच्चे की जिम्मेदारी लेना शुरू किया और जल्द ही हिंसक सेनारी गाँव में विद्यालय बन गया। गाँव में आदमियों की संख्या बहुत कम थी। इस कारण यह काम ज्यादा मुश्किल हो गया। कुछ आदमी आतंकवादियों के समूह ने मार दिए थे और जो बच गए थे वे जेल की सलाखों के पीछे थे। जिन औरतों को घर रहने के लिए कहा गया था उन्हें मनाना थोड़ा मुश्किल था लेकिन वे आर्ट ऑफ लिविंग और इसके विद्यालय की परियोजना के लिए सहायता करने को तैयार हो गईं।
अगला कदम
जब विद्यालय सफलतापूर्वक चलने लगा तो श्रीमती सिन्हा कारावास के लिए कुछ समाज सेवा करने के विचार से पटना लौट आईं। जेल में रहने वालों के लिए अवश्य ही कुछ करना चाहिए। उन्होंने सोचा कि जेल ही एक ऐसी जगह है जहाँ वह नकसली समूह के लोगों से मिल पाएँगी। उन्होंने सोचा कि वह तब ही एक सुधार ला सकती हैं जब वे सभी कानून की नजर में हैं। यह उनके लिए और उनके परिवार के लिए एक नई शुरूआत होगी। इससे उन्हें बेउर जेल में रहने वालों के लिए एक नया कोर्स शुरू करने की प्रेरणा मिली।
जिले के मैजिस्ट्रेट को एक स्त्री को कारावास में कट्टर अपराधियों के बीच जाने की आज्ञा देने में संकोच था। बहुत सी समस्याओं के बाद भी श्रीमती सिन्हा ने कड़ी निगरानी में जेल के कैदियों के साथ प्रिजन प्रोग्राम शुरू कर दिया। जेल का कार्यक्रम अपने आप में कुछ अलग ही था, प्रगतिशील, परिणाम उन्मुख कार्यक्रम, हिंसा के चक्र को तोड़ते हुए, सब ओर बढ़ते हुए अपराधों का हल। इस कार्यक्रम ने कैदियों को पुनर्वास और बड़े पैमाने पर समाज के साथ एकीकृत होने का मौका दिया। प्राथमिक रूप से यह लाभ गुरुदेव द्वारा संचालित सुदर्शन क्रिया के कारण सम्भव हो सके जो अपराध के कारण तनाव को जड़ से मिटा देती है।
प्रेम अभिव्यक्त करने और उसे याद न दिलाने का मंत्र
बेउर जेल के कैदियों को 200 से अधिक अपराध करने के कारण सजा मिली थी। श्रीमती सिन्हा ने जेल के अधिकारियों से कहा कि इतनी कड़ी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। बल्कि उन्होंने बताया कि यह सब उनके सुरक्षा कर्मचारी हैं। सभी इनसानों का स्वभाव हिंसा नहीं बल्कि प्यार है। एक इन्सान में परिवर्तन आसपास के माहौल और उसके जीवन में घट रही घटनाओं से आता है।
हर अपराधी के पीछे एक पीड़ित होता है। प्यार, करुणा, समझदारी और धैर्य से परिवर्तन न आए ऐसा हो ही नहीं सकता।
– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर
बहुत ही संवेदनशीलता और नम्रता से श्रीमती सिन्हा ने कैदियों को बताया कि घृणा और हिंसा करना ठीक नहीं है और जेल के अंदर भी परिवर्तन आ सकता है।
“इन्सान में बदलाव की वजह उसका माहौल और उसके जीवन में चलने वाली घटनाएँ होती हैं। मैंने कैदियों को बताया कि घृणा और हिंसा करना ठीक नहीं है और सबसे आवश्यक बात है कि वर्तमान हालात को बदला जाए और शांति की शुरुआत की जाए।”
सबसे जरूरी बात यह है कि वर्तमान हालात को बदला जाए, हिंसा की जगह प्यार और शांति की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। एक दूसरे को प्यार करें और भूतकाल में जो भी हुआ उसे भूल जाएँ।
परिवर्तन
परिवर्तन शुरू हुआ जब चार खूंखार कैदी जो जेल के अंदर की हिंसा से जुड़े हुए थे और जेल के कर्मचारियों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गए थे। जल्दी ही उन्होंने इंदु को दीदी कहकर बुलाना शुरू कर दिया।
कैदी आभार से भर गए थे। जेल के अधीक्षक श्री सुरेंद्र कुमार गुप्ता ने कैदियों के व्यवहार और सोच में परिवर्तन देखा। वह इन खूंखार कैदियों में साफ परिवर्तन देखकर हैरान थे। सुधारवादी पुलिस कर्मचारी श्रीमती किरण बेदी ने एक बार कहा था, “सलाखों के पीछे कैदी तनाव में रहते हैं क्यूँकि वे अपने परिवार से दूर रहते हैं और अपने परिवार की चिंता उन्हें बार बार तंग करती है। यहाँ तक कि अपराधियों के साथ निपटने वाले पुलिसकर्मी भी बहुत चिंता में आ जाते हैं। आर्ट ऑफ लिविंग कार्यक्रम इन दो वर्गों के लिए खास महत्व रखता है।” जो व्यक्ति लोगों के दिल में खौफ पैदा करते थे और जेल के सुरक्षा कर्मचारियों के लिए लगातार परेशानी का कारण थे वे अब आज्ञाकारी और निर्दोष बन गये थे। उनका घातक रुप अब बहुत मधुर बन गया था।
राम चंद्र सिंह, 55 वर्षीय, जो 4 साल से जेल में थे, उन्हें बहुत खतरनाक माना जाता था और वे अशांति उत्पन्न करने में माहिर थे। अब उन्होंने हमेशा के लिए किसी भी अपराधिक गतिविधि में भाग न लेने का निर्णय कर लिया। अचानक ही उनके अंदर प्रेम और स्नेह की भावना आ गई। वे कहते हैं, “पहले कुछ भी करता था गलत ही करता था।”
हरि बदन सिंह, एक और खूंखार अपराधी, अब अपने गुस्से पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो गए हैं और पूरी तरह से शांत रहते हैं। अचानक ही उनके अन्दर प्रेम और स्नेह की भावना आ गई है। बड़े पैमाने पर प्रोग्राम में भाग लेने वालों के अंदर ठीक होने की भावना आ गई है और बहुत से भागीदारों की शारीरिक बीमारियाँ ठीक हो गई हैं।
संख्या में बढ़ोतरी
आर्ट ऑफ लीविंग कार्यक्रम 13 जनवरी को समाप्त हुआ पर कैदी इंदु को भेजना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति के अनुसार, घर की बेटी आज के दिन अपना मायका नहीं छोड़ेगी। बहुत ही प्रभावित इंदु जी ने उनकी इच्छा का मान रखते हुए अगले दिन संक्राति के शुभ अवसर पर उनका घर छोड़ा।
जहाँ एक समय पर केवल मंझे हुए बदमाश दिखाई देते थे, वहाँ अब कोमल हृदय और आँखों में कृतज्ञता के आँसू दिखाई दे रहे हैं, और उन सब लोगों ने इंदु जी को जेल के दरवाजे तक छोड़ा। बर्ताव और दृष्टिकोण में यह परिवर्तन देखते हुए हैड वार्डन श्री गणेश प्रसाद ने पास खड़े जेल सुपरीटैनडेंट श्री सुरेंद्र कुमार गुप्ता को कहा, “यह सब तो साधु संत बन गए हैं!”
तब से बिहार की केंद्रीय व जिला जेलों में इस तरह के कोर्स संचालित किए गए और अद्भुत परिणाम सामने आए। पटना, आरा, गया और मुजफ्फरपुर में लगभग 4,000 कैदियों ने प्रिजन प्रोग्राम अनुभव किया, जिन में 2,500 से अधिक बेउर जेल के कैदी थे। यह कहना गलत नहीं होगा “एक समय पर यह जेल था, परंतु अब एक आश्रम है।”